Wednesday, 24 February 2021

Rajasthan history

                                                                राजस्थान का इतिहास   



राजस्थान का इतिहास  जानने के स्रोत 

  • मह्त्वपूर्ण  शिलालेख एवं प्रशस्तियाँ 
  • प्रमुख सिक्के                                                                                  
 मह्त्वपूर्ण  शिलालेख एवं प्रशस्तियाँ  :-  राजस्थान के इतिहास को जानने में इनका मह्त्वपूर्ण  योगदान रहा है | ये निम्न है | 

  • जैन कीर्ति स्तम्भ के लेख 
  • श्रृंगी  ऋषी के लेख 
  • रणकपुर  प्रशस्ति 
  • कीर्ति  स्तम्भ  प्रशस्ति आदि 
 प्रमुख सिक्के:-  भारत के पुराने सिक्को को पंचमार्क या आहत सिक्के कहा  जाता था |   जेम्स प्रियंसेप ने 1835  में इनको पंचमार्क(कषर्पण )  कहा | इनको बनाने में मुख्यतया चाँदी और तांबे  का प्रयोग होता था | ये राजस्थान में जयपुर(बैराठ ), टोंक (रैढ़ ) सीकर(गुरार ), चित्तौडग़ढ़ (नगरी ), भरतपुर (नोह ) में मिले है | ये निम्न है 

  • आहड़  के सिक्के 
  • रैढ़  के सिक्के 
  • मेवाड़ के सिक्के  
  • मारवाड़ के सिक्के 
  • आमेर के सिक्के
                                                  राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएँ   

राजस्थान में कई  प्राचीन सभ्यताएँ  पायी गयी है | इनमे प्रमुख निम्न है -
  • कालीबंगा की सभ्यता 
  • आहड़  की सभ्यता 
  • गणेश्वर की सभ्यता  
  • बालाथल की सभ्यता 
  • बैराठ की सभ्यता 
कालीबंगा की सभ्यता :-  यह सिंधु घाटी से पहले की या समकालीन सभ्यता है |  इसकी खोज राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में  1952  ई. में बी. वि. लाल एबं वि. के. थापड़  ने की | कालीबंगा सुनियोजित नगरीय प्रधान  सभ्यता थी  माकन कच्ची और पक्की ईंटो के बने थे। पानी निकास के लिए नालिया बानी हुयी थी। यहां  चूल्हे तंदूर के सामान थे। परकोटे के बहार  जुते  हुए खेत जो बिश्व में जुते  हुए खेतो का पहला उदाहरण है। यहाँ घरो में पक्के फर्श थे।  यहाँ  लोहे और घोड़ों  के  प्रमाण नहीं  है। इसका समय इतिहासकार 2350  ई. पु. से 1750  ई.  पु. बताते है।   
आहड़  की सभ्यता :- आहड़ नदी के किनारे उदयपुर में इसकी खोज हुयी। इसे  (आहड़) ताम्रवती नगरी भी बोलते है।  इसकी खोज अक्षय कीर्ति ने 1953  में की|  स्थानीय लोग इसे शुलकोटा भी बोलते है। यहाँ  लाल काळा मिटटी के बर्तनो का प्रमुख केंद्र था यह के घर कच्ची मिटटी की ईंट  और पत्थर  के बने हैं। यहाँ 6 ताम्बे की मुद्रा और कुछ मोहरे मिली है। यहाँ  ताम्बे की बस्तुऐं  बनाने का मुख्या केंद्र  था।  यहाँ के लोग आभूषण कीमती पत्थरो के और पाकी हुयी मिटटी के मोतियों के बनाते   आहड़ सभ्यता के लोग कृषि से परचित थे।  यहाँ रंगाई छपाई का काम  भी प्रचलित थे। 
तोल  के लिए बाट एवं माप  भी मिले है।  इसका समृद्ध काल  1900  ई.  पु. बताते है| 
गणेश्वर की सभ्यता :- गणेश्वर का टीला तहसील नीम  का थाना , सीकर में  इसकी खोज हुयी 
इसकी कह तिथि 2800  ई.  पु. निर्धारित है। इसे भारत की ताम्रयुगीन निर्विवाद सभ्यता खा जाता है। इस सभ्यता में शिकार बहुत होता था।  यहाँ मछली पकड़ने का कांटा भी प्राप्त हुआ है।  घर पत्थर के बने होते थे। 
बैराठ की सभ्यता :- इसकी खोज जयपुर से 85 किमी. दूर बैराठ में हुयी।  इसके स्थल बीजक की पहाड़ी महादेव जी की डुगरी  आदि से मिले है| यहाँ सूती कपड़ा हाथ से बना हुआ मिला है। एक खण्डार नुमा भवन मिला ह जिसमे (6 -7 ) कमरे है। 36  मुद्रा मिली है  जिसमे 16  यूनानी राजाओ की है।  जिससे पता चलता ह की यहां यूनानी राजाओं  का अधिकार था। घर मिटटी की बनाई ईंटो से बने है। इसका प्राचीन नाम विराटपुर था जो मत्स्य प्रदेश की राजधानी थी। यहाँ अशोक का भाब्रु शिलालेख भी मिला है।
                                              राजस्थान के प्रमुख राजवंश
  • गुर्जर प्रतिहार वंश 
                                             राजस्थान का मध्यकालीन इतिहास  
  • चौहानो का इतिहास 
  • गहलोतों   का इतिहास 
  •  राठौड़ का इतिहास 
  • कछवाहो का इतिहास  
चौहानो का इतिहास:- राजस्थान के सबसे पुराने राजवंश चौहानो का उद्गम स्थान शाकम्भरी साम्भर (सपादलक्ष ) में हुआ। इसका पता विग्रहराज तृतीय के हर्ष अभिलेख से सोमदेव के बिजोलिया अभिलेख से विग्रहराज  चतुर्थ के दिल्ली शिवालिक अभिलेख से चलता है।  
                ,
  • नयन चंद्र सूरी (हम्मीर महाकाव्य ) 
  • चंदरबरदाई कृत (पृथ्वीराज रासो )
  • जयनायक रचित(पृथ्वीराज विजय )
  • सिंगराज :- प्राचीन कल में प्रतिहारो के शासन काल  में चौहान प्रतिहारो के सामंत थे। दसवीं सदी में सिंगराज ने खुद को स्वत्रंत कर महाराजधिराज की उपाधि धारण की।  इनकी राजधानी सांभर  थी। 

  • विग्रहराज द्वितीय :- हर्ष के अभिलेख से पता चलता है की उसने अपने राज्य का बहुत उध्दार किया। 
विग्रहराज ने आशापुरी देवी का मंदिर बनवाया। इसने गुजरात के चालुक्य नरेश मूलराज को पराजित किया। मूलराज ने भागकर कांयदुर्ग  में छिप  गया। 
  • दुर्लभराज द्वितीय :- विग्रहराज के कोई उत्तराधिकारी न होने के कारण इसका भाई दुर्लभरकाज आसीन हो गया। 
  • गोविंदराज द्वितीय:- यह दुर्लभ का दूसरा पुत्र था।  इसने वैरिदारथ (शत्रु का नाश करने वाला )की उपाधि धारण की। 
  • वाक्यपतिराज द्वितीय:- गोविन्द राज द्वितीय का पुत्र इसने गुहिलवंश  शासक अम्बा को पराजित किया। 
  • वीर्यराम :- वाक्यपतिराज द्वितीय का पुत्र और एक कमजोर शासक जो अपने राज्य की रक्षा नई कर सका। 
  • विग्रहराज तृतीया :- इसने चौहान शासन का विस्तार उत्तर से पूर्व तक किया इसके समय में परमारो और चौहानो में मित्रता हो गयी थी।  
  • पृथिवीराज प्रथम :- विग्रहराज तृतीया  का पुत्र परम भट्टारक महरजाधिराज की उपाधि धारण करने वाला। इसने रणथम्भोर के जैन मंदिर पर स्वर्ण  कलश चढ़ाया।प्रथ्वीराज विजय के अनुसार इसने चालुक्यों को पराजित किया। 
  • अजयराज चौहान :- पृथिवीराज प्रथम का पुत्र।  इसने 1113  में अजमेर नगर की स्थापना की और चौहानो की राजधानी अजमेर को बनाया।1113  में तारागढ़ किले(गढ़  बीठडी का किला ) का निर्माण बिठली की पहाड़ी पर  करवाया। इसने चौहान राज्य का  अधिक से अधिक विस्तार किया। इसने मालवा राज्य पर विजय प्राप्त की। मथुरा के आस पास के क्षेत्र में प्राप्त मुद्रा इस क्षेत्र में इसका अधिकार बताती है प्रथ्वीराज विजय के अनुसार इसने तुर्की पर विजय प्राप्त की। अंत में राज्य अर्णोराज को देकर पुष्कर चला गया। 
  • अर्णोराज :-परमेश्वर ,परमभट्टारकर ,महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।  यह शैव  मतवमबी था। पुष्कर में वराह मंदिर एवं  12  मंदिर बनवाए।  अंत में पुत्र जगदेव ने हत्या कर दी। इन्होने 1133  से 1150 तक शासन किया। 
  • विग्रहराज चतुर्थ :- (1153 -1163 ई. )यह अर्णोराज के पुत्रों  में सबसे बलवान था। यह विद्वानों का आश्रयदाता था।  यह बीसलदेव के नाम से विख्यात हुआ इसे संस्कृत का  ज्ञान था इसने हरिकेली नमक नाटक की रचना की इसमें अर्जुन व् शिव के मध्य युद्ध का वर्णन  है। स संस्कृत विद्यालय की स्थापना की बाद में उसे 1199  तोड़ दिया गया और उसे कुतुबुद्द्दीन ने दे दिन के झोपड़े में बदल दिया। 
इसने तोमरो को  पराजित के दिल्ली पर विजय हासिल की। चालुक्यों पर व् परमारो पर विजय हासिल क्र मेवाड़ मारवाड़ नाडोल चित्तोरगढ व् जालौर को मिला लिया। शिवालिक लेख के अनुसार तुर्को से अपने राज्य की रक्षा की। 
  • पृथ्वीराज दिव्तीया:- (1164 -1169ई. ) जगदेव के पुत्र थे।  उपरगांगे की हत्या क्र शासन लिया इसने तुर्को से राज्य की रखा के लिए हंशी के दुर्ग को जीता। 
  • पृथ्वीराज तृतीया :-(1177 -1192 ई. ) यह चौहान वंश का सबसे एंटीम शासक था इसे रायपिथौरा के नाम से भी जानते है। इनकी माता कर्पूर देवी थी।  सबसे पहले इसने अपने चाचा नागार्जुन को परास्त किया जो अजमेर का शासक था।  1182  में परमर्दिदेव को हराकर महोबा को जीता महोबा के युद्ध में गहड़वाल नरेश जयचंद्र के विरुद्ध सरदरों  आल्हा व् उदल के साथ चंदेल नरेश की सहायता की। यह जयचंद की बेटी को भगाकर ले गया। 
                     मोहम्मद गौरी के साथ तराइन  का युद्ध लड़ा जिसमे 1191 में गौरी पराजित हुआ और 1192 में धोखे से पृथ्वीराज को हराकर कैद कर लिया। इसके बाद भारत पर मुस्लिमो का अधिकार हो गया। पृथ्वीराज एक महान योद्धा के  साथ  एक कला प्रेमी भी था।   पृथ्वीराज की हर के बाद इसका पुत्र रणथम्भौर गया और चौहान वंश की नीव रखी। 
जौलर के चौहान :-  इनकी जानकारी नैणसी  के नैणसी  री ख्यात , आमिर ख़ुसरो के आशिका ,पद्मनाभ के कान्हड़दे प्रबंध नसे मिलती है।  इसका प्राचीन नाम जबलपुरी था।  और इसके दुर्ग को स्वर्णगिरि बोलते थे। 

जालौर की स्थापना कीर्तिपाल  ने की थी।  कीर्तिपाल अल्हड का सबसे छोटा पुत्र था। इसने परमार शासको कुन्तपाल और वीरनारायण को हराकर अपना राज्य स्थापित किया। 
                कीर्तिपाल का उत्तराधिकारी समर सींग  था। इसने किले को मजबूत करबाया और गुजरात के राजा की बेटी से अपने विवाह सम्बंद बनाये।  
समर सिंह का उत्तराधिकारी उदय सिंह हुआ। इसने दिल्ली के सल्तनत आक्रमण को विफल किया। इसने तुर्को को भी नियंत्रित किया। 
उदय सिंह की मृत्यु के बाद चाचींगदेव राजा बना और इसके बाद सलामत सिंह , कान्हड़देव ने राज किया 
  • कान्हड़देव:- यह इस वंस का  सबसे प्रतापी राज हुआ। इसकी रानी जैतलदे थी और पुत्र का नाम वीरमदेव था।  इसके कल में अल्लाउद्दीन खिलजी ने जेलर पर 1309 और 1311 ई. में आक्रमण किया जिसमे कान्हड़देव और वीरमदेव लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और जैतलदे ने जौहर किया। 
सिरोही के चौहान:- यह देवड़ा का शासन था, जिसकी स्थापना लुम्बा में 1311  में हुयी। इसकी राजधानी चन्द्रबती थी शासमल ने 1425 में सिरोही नगर बनाया और इसे अपनी राजधानी घोषित किया।  शिवसिंह ने 1823  में अंग्रेजो से हाथ मिला लिया।
हाड़ौती के चौहान:- 1342  में देवसिंघ ने हाड़ौती  में चौहान वंस की स्थापना की। इसका आखरी राजा वीर सिंह था जो मुसलमानो के साथ लड़ते हुए मारा गया। इस तरह इस्सस राज्य का पतन हुआ।  यहाँ मीणा जाती बहुतायत में पायी जाती है इस क्षेत्र में बूंदी कोटा और बारां  आते है। बूंदी का नाम बूंदा सिंह मीणा के नाम पर पड़ा। 1569  में राव सुरजन ने अकबर के साथ संधि कर ली। और 1818  में इसे ईस्ट इंडिया में मिला दिया गया। 

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